बीकानेर। मानव धर्म प्रचार सेवा संस्थान के तत्वावधान में 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक स्थानीय पारीक चौक स्थित भागवत बासा भवन प्रांगण में बालसंत डॉ श्रीछैल विहारी महाराज के द्वारा आश्विन मास की नवरात्रि पर 9 दिवसीय प्रवचन माला एवं हवन यज्ञ अनुष्ठान के साथ 108 कंजक पूजन के साथ नवरात्रि का महा पर्व मनाया जा रहा है।
मनु महाराज ने बताया कि उपरोक्त नव दिवसीय अनुष्ठान में उधोगपति कुन्दन आसदेव बम्बलु परिवार और उधोगपति द्वारका प्रसाद लड्ढा की संयुक्त यजमानी में उपरोक्त नवरात्रि हवन-यज्ञ अनुष्ठान की शुरुआत हुई। उपरोक्त नवरात्रि अनुष्ठान में के शुभारंभ अवसर पर घट स्थापना के साथ गणेश नवग्रह सप्तश्रषि मंडल सोडषमात्रिका का पंचोपचार पूजन किया गया। तत्पश्चात सुबह दोपहर शाम तीन कालों में नित्य गणेश अथर्वशीष पाठ, दुर्गा सप्तशती, गायत्री कवच एवं इंन्द्राक्षी स्त्रोत कवच, श्रीसुक्तम स्त्रोत के पाठ एवं गायत्री बीज मंत्र से नित्य हवन यज्ञ के साथ नवरात्रि अनुष्ठान पर्व की शुरुआत हुई। नवरात्रि अनुष्ठान में बालसंत डॉ श्रीछैल विहारी महाराज द्वारा 9 दिनों तक नित्य 14 कन्याओं के चरण पुजन प्रवचन माला के साथ पक्षी पर्यावरण संरक्षण संदेश के साथ गमलों सहित पोध वितरण ओर पक्षियों की जल सेवार्थ जल परिन्डे वितरण किए जायेंगें। मनु महाराज ने बताया अनुष्ठान पुर्णाहुति अवसर पर यजमान उधोगपति द्वारका प्रसाद लड्ढा एवं कुंन्दन आसदेव परिवार द्वारा 108 कन्याओं के चरण पुजन के साथ भंडारा प्रसादी भी रखी गई है। अनुष्ठान भंडारा चरण पुजन व्यवस्था सेवाश्रम हेतु विनिता डागा, मोनिका गहलोत, मंजू, रक्षा, खुशी पारीक, श्यामा जोशी, सीमा पारीक, ढोला पुरोहित राजकुमारी व्यास सहित 9 महिलाओं की टीम भी अपनी सहभागिता निभा रही है। प्रथम दिवस प्रवचन करते हुए बालसंत डॉ श्रीछैल विहारी महाराज द्वारा नवदुर्गा स्वरूपों की व्याख्या करते हुए बताया कि कि नवरात्रि के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। शैल का अर्थ है पर्वत और पुत्री का अर्थ होता है बेटी। इसलिए पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा है। माँ शैलपुत्री के एक हाथ में त्रिशूल है दूसरे हाथ में कमल का फूल है। उनका वाहन वृषभ है। बालसंत जी ने कहा कि माता के हाथ का त्रिशूल हमें संदेश देता है,कि हमें ब्रह्म विष्णु महेश द्वारा सृजित सृष्टि सृजन पालन पोषित संसार रुपी मृत्युलोक में जीवन यापन करते हुए अपने मन से बुराई, क्रोध और अहंकार रूपी तीन विकारों से सदेव दूर रहने का अभ्यास करना चाहिए।। ओर माता के हाथों में सुशोभित कमल का फूल हमें सिखाता है कि संसार में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों हमें अपने मन की पवित्र और विनम्र बनाए रखना चाहिए।
मन, चित्त और बुद्धि को विकार मुक्त एवं सहस्त्र यज्ञों के समान फल प्राप्ति व पुण्य अर्जित की पावन साधना है नवरात्रिकाल : बालसंत डॉ श्रीछैलविहारी महाराज

